कांस्टेबल हो ईमानदार तो दारोगा भी नही होगा रिश्वतखोर



नवीन चौहान
जनता की सेवा और सुरक्षा में तैनात रहने वाली खाकी पर अक्सर रिश्वत लेने के आरोप लगते है। सड़क पर डयूटी करने वाले कांस्टेबल हमेशा से ही जनता की नजर में संदेह के घेरे में रहते है। पुलिस कांस्टेबल भी खनन के वाहनों से ओवरलोडिंग की चेेकिंग के नाम पर कुछ ना कुछ वसूली करते ही है। जिसके चलते ऐसे तमाम सिपाहियों को अपने थानेदार को हिस्सा देना होता है। अगर यही कांस्टेबल अपनी डयूटी पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से निभाए तो उनकी वर्दी पर कोई आंच नही आ सकती और थानेदार को हिस्सेदारी भी नही देनी होगी। और तो और बड़े साहब की बेगारी से भी मुक्ति मिलेगी।
कांस्टेबल का थोड़ा सा लालच उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देता है।
पुलिस महकमे में कांस्टेबल पद सबसे महत्वपूर्ण है। या यूं कहे कि खाकी वर्दी के महकमे की रीढ़ की हडडी है। समूचा पुलिस महकमा कांस्टेबल पर ही निर्भर है। जनता की शिकायत पर सबसे पहले पहुंचने वाला कांस्टेबल ही होता है। सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाला भी कांस्टेबल ही होता है। आपको सुरक्षा प्रदान करने के लिए सर्दी, गर्मी, धूप और बारिश में चेकिंग और रात्रि गश्त करने वाला भी कांस्टेबल ही होता है। अपराधियों की सुरागरसी और पतागरसी करने की जिम्मेदारी भी कांस्टेबल की होती है। बदमाशों की गोली का पहला निशाना भी कांस्टेबल ही होता है। पुलिस अफसरों की सुरक्षा करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी कांस्टेबल को ही निभानी होती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि इतने जिम्मेदार पद पर काबिज रहने वाले व्यक्ति पर ही वसूली के आरोप लगते है। कांस्टेबल को ही लापरवाही के आरोप में निलंबन की कार्रवाई को झेलना पड़ता है। आखिरकार इसके पीछे की वजह क्या है।
इसको जानने और गहराई से समझने की जरूरत है। पुलिस महकमा अनुशासित फोर्स है। जिसमें अफसरों और अधिकारियों का आदेश सर्वोपरि है। अफसरों के आदेश को पूरा करना कांस्टेबल का नैतिक दायित्व है। अफसरों का वह कार्य व्यक्तिगत हो या आफिसियल लेकिन कांस्टेबल को पूरा ही करना होता है। बस यही से पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार का खेल शुरू होता है। जिसके लिए कांस्टेबल को अपना इमान गिरवी रखना पड़ता है।
मुफ्तखोरी का चस्का
पुलिस को मुफ्तखोरी का चस्का लगा होता है। पुलिस जब सड़क पर निकलती तो सभी लोग घबराने लगते है। दो पहिया वाहन चालक को हेलमेट के चालान का डर बना रहता है तो दुकानदार को अतिक्रमण के नाम पर चाबुक चलाने का। होटल वाले चेकिंग के नाम पर उत्पीड़ने करने का। कुल मिलाकर सभी लोग पुलिस को देखते ही आवभगत में जुट जाते है। ऐसे में पुलिस को किसी दुकान की चाय तो किसी रेस्टोरेंट का खाना मुफ्त मे मिलता है। अब जब वही खाना दोबारा खाने की इच्छा हो तो वह लाने की जिम्मेदारी कांस्टेबल की शुरू होती है। कांस्टेबल यही से भ्रष्टाचार की पहली सीढ़ी चढ़ना शुरू होता है।
अब भष्ट थानेदार से लेकर भ्रष्ट अफसर कांस्टेबलों का शोषण शुरू कर देते है। जिसका अंतिम परिणाम वसूली और रिश्वतखोरी पर आकर ठहरता है। इस तमाम मुफ्तखोरी के खेल के परदे के पीछे कांस्टेबल की मेहनत और कर्तव्यनिष्ठा पीछे छूट जाती है।
जनता के लिए कहने को रह जाता है कि पुलिस भ्रष्ट है। कांस्टेबल वसूली कर रहे है। लेकिन यह जानना भी जरूरी है कि कांस्टेबल यह वसूली ​कर किसके लिए रहे है। क्या अफसरों की कुर्सी पर बैठे सभी लोग ईमानदार है। सभी अफसर अपने वेतन से ही गुजर बसर कर रहे है। पुलिस अफसर किसी कांस्टेबल से अपना व्यक्तिगत कार्य नही कराते। सरकारी वाहन से परिवार को शापिंग करने नही जाते। कांस्टेबलों से घर की सब्जियां और राशन तो नही मंगाते। यह सभी विचारणीय है।
लेकिन इससे बड़ी बात कि भष्ट सिस्टम के बीच कुछ कांस्टेबल अपना इमान गिरवी रखने को राजी नही होते है। ऐसे ईमानदार कांस्टेबल पुलिस अफसरों को बेहद ही खराब लगते है। क्योकि वह भष्ट सिस्टम का हिस्सा नही होते।

शेष अगली कड़ी में वर्दी वाली पुलिस प्रापर्टी डीलर


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