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खंजन पक्षी

हिमालय की वर्फ छोड़कर हरिद्वार पहुंचे खंजन पक्षी

नवीन चौहान
हिमालय की उतंग चोटियों पर बर्फ पड़ने के साथ ही हिमालय से सैकड़ों प्रजाति के पक्षी उत्तर व दक्षिण भारत के मैदानी क्षेत्रों, ताल-तलैयों में प्रवास के लिए प्रतिवर्ष आते हैं। फिलहाल हरिद्वार में इन संजन पक्षियों ने डेरा डाल लिया है। इन पक्षियों को देखकर कोई भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता है। खंजन पक्षियों का इतिहास में बहुत वर्णन है। प्रसिद्ध ​कवियों और विद्वानों ने अपनी पुस्तकों में  खंजन पक्षियों के बारे में लिखा है। महा​कवि तुलसीदास से लेकर मैथिनीशरण गुप्त ने अपनी कविताओं में इनका बहुत खूबसूरती से वर्णन किया है।

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं सुप्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक प्रो. दिनेश भट्ट ने बताया कि हिमालय का सुन्दर नेत्रों वाला खंजन पक्षी हरिद्वार व भारत के अन्य मैदानी क्षेत्रों में पहुंच चुके है। कजरारी आंखों वाले खंजन की पांच-छह प्रजातियों में से तीन प्रजातियां माइग्रेटरी है जो प्रतिवर्ष, लेह-लद्दाख, कश्मीर, कुल्लू-मनाली, नीति-माणा जैसे दुर्गम पर्वतीय स्थलों से निकलकर शीत कालीन प्रवास पर मैदानी क्षेत्रों में आती है और वसंत ऋतु में पुनः ‘प्रणय-लीला’ करने वापस अपने धाम पहुंच जाती है।

डा. भट्ट ने बताया कि खंजन पक्षी को ग्रे-वैगटेल या ग्रे-खंजन के नाम से भी जाना जाता है जो अपनी लम्बी दुम, सलेटी-पीठ, तथा पीले पेट और बार-बार दुम ऊपर-नीचे गिराने व उठाने के कारण आसानी से पहिचाना जा सकता है। दुम को बार-बार ऊपर-नीचे करना सभी खंजनों की विशेषता है। उन्होंने कहा कि हिमालयी खंजन व केवल उत्तर भारत के क्षेत्रों में अपितु मुम्बई व दक्षिणी पठार के अनेक क्षेत्रों तक पहुँच जाता है और इनकी याद्दाश्त इतनी तेज होती है कि जिस क्षेत्र व बगीचों में पिछले वर्षों में आती है उसी क्षेत्र को ये प्रतिवर्ष शीत प्रवास हेतु चुनती है।

प्रसिद्ध साहित्यकार मैथलीशरण गुप्त तो इस मोहक खंजन से इतने मोहित हुये कि महाकाव्य ‘साकेत’ में लिखा, “स्वागत स्वागत शरद भाग्य से मैंने दर्शन पायेनिरख सखी ये खंजन आए।”

संत तुलसी दास भी किष्किंधा कांड में प्रकृति का वर्णन करते समय कहते हैं,‘ जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।’

तुलसीदास इस तथ्य के वर्णन में कहते हैं कि शरद ऋतु में खंजन आए क्योंकि यह लंबी अवधि में किए गए हमारे पुण्यकर्मों का सुफल है।

रामचरित मानस ‘‘तुलसी’’ में वनवास के समय जब ग्रामीण महिलाएं सीताजी से पूछती हैं कि साथ के दो सुंदर सशक्त युवकों में से उनके पति कौन हैं, तब सीताजी रामचंद्र जी का न तो नाम लेकर और न हाथ से इशारा कर उतर देती हैं, वरन ’कहती’ हैं, ‘‘खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सैननि।’’ अपने खंजन के समान सुंदर नयनों से रामचंद्र जी की तरफ तिरछे देखते हुए मानो ’कह’ देती हैं कि यही हैं मेरे पति।

डा. भट्ट की बायोअकाउस्टिक लैबोरेट्री के शोध छात्र रोबिन राठी, आशीष आर्य व पारूल ने बताया कि इन दिनों उन्होंने ग्रे-वैगटेल (खंजन की एक प्रजाति) को यदा-कदा गाते हुये सुना है। पक्षी-वैज्ञानिकों के लिये यह कौतुहल का विषय है कि जब बसंत और ग्रीष्म में पक्षियों में गीत-संगीत व प्रजनन का समय समाप्त हो गया है तो शरद में गीत गाकर यह पक्षी क्या कहना चाहता है?

खंजन का अर्थ है – आकाश में जन्म लेने वाला! यह कैसे? हमारे ऋषि हिमालय की पवित्र उंचाइयों पर रहने वाले थे। प्रकृति से उनका गहरा लगाव होता था तथा उसका पैना और गहरा अवलोकन भी उन्होंने किया। शरद ऋतु में भी वे रोज सुबह शाम प्रकृति का आनंद लेते होंगे। तभी एक रूपहले दिन अचानक हिमालयी आकाश से हज़ारों की संख्या में ये प्रवासी पक्षी नीचे उतरते दिखे होंगे। ऋषियों ने इन सुंदर अतिथियों को नाम दे दिया ’खंजन!’ पक्षी-वैज्ञानिक कुछ वर्ष पूर्व तक यही मानते रहे कि साइबेरिया, रूस आदि से भारत आनेवाले प्रवासी पक्षी हिमालय की उंचाइयों को पार कर नहीं आ पाते होंगे, अतः वे हिमालय के दर्रों से ही आते होंगे। किंतु हमारे ऋषि हिमालय की उंचाइयों ‘जैसे बद्रीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ आदि’ में रहनेवाले थे, दर्रों में रहनेवाले नहीं। किंतु जब एवरेस्ट पर चढ़नेवाले पर्वतारोहियों ने भी यह बतलाया तब पक्षी वैज्ञानिकों ने भी मान लिया कि ये प्रवासी पक्षी हिमालय के पार उड़कर आते हैं, मात्र दर्रों से नहीं।

पक्षियों की सुरक्षा, वनों का जीवंत होना तथा जलाशयों का प्रदूषण रहित होना – इनमें लंबे समय तक कार्य करना पड़ता है, तब कहीं ये सुफल देते हैं। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि यदि हम ये वांछित पुण्यकर्म न करें, तब भी इनका ‘कुफल’ हमें देर से मिलेगा। जैसा भरतपुर के पक्षी अभयारण्य में ‘ललमुख सित क्रौंच’ (‘साइबेरियन क्रेन’, ग्रुस लेउको जैरानुस’) का साइबेरिया से आगमन पिछले 12, 15 वर्षों से कम हो रहा और अब लगभग बंद ही हो गया है। एक तो, उनको अपने अफगानिस्तान पड़ाव में मानव शिकारियों से अत्यधिक क्षति होती है। दूसरे, भरतपुर की झील में पानी कम होता जा रहा है तथा गांव के ढोरडंगर अत्यधिक संख्या में अभयारण्य के मैदानों में चरने के लिए आ जाते हैं जो पक्षियों के जीवन में बाधा डालते हैं। ये मानव जाति के दीर्घकालीन पापकर्म हैं कि ललमुख सित क्रौंचों ने भारत में प्रवासन बंद कर दिया है

उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विनय सेठी के अनुसार अन्य सुन्दर पक्षियों का चित्रण भी हमारे संस्कृत साहित्यकारों ने खूब किया है। सूरदास ने भ्रमरगीत द्वारा, जायसी ने पद्मावत द्वारा चन्द्र चकोर का प्रेय, हंस की आकर्षक चाल, चकवा-चकई व तोता-मैना की कथा का मोहक वर्णन किया है। प्रवासी पक्षियों में ‘सुरखाब के पंख’ की बात सर्वत्र विदित है।

उल्लेखनीय है कि डा. दिनेश भट्ट पक्षी विज्ञान में जाने माने हस्ताक्षर है जिन्हे विश्व में भी दो संस्थाओ ने अपनी कार्यकारणी में स्थान दिया है। हाल ही में उन्हें हरिद्वार गौरव सम्मान से नवाजा गया है

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