विलुप्त हो रही धान की किस्मों को संरक्षित करें वैज्ञानिक: कुलपति डॉ. मित्तल


मेरठ। उत्तर प्रदेश में धान की कई प्रजातियां ऐसी हैं जो अब विलुप्त होती जा रही हैं लेकिन इनके स्वाद और खुशबू को अभी तक लोग भूल नहीं पा रहे हैं। आज भी लोग धान और बासमती चावल की खुशबू के शौकीन हैं। लेकिन उनको खुशबूदार चावल अब आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। धान की कई प्रजातियां ऐसी हैं जो खोजने से भी नहीं मिल पा रही हैं।

कुलपति ने कहा की विलुप्त हो रही प्रजातियों का किसानों के हित में संरक्षण बहुत जरूरी है इससे नई प्रजाति विकसित करने में सहायता मिलेगी। कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर आरके मित्तल ने बताया की विलुप्त हो रही प्रजातियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इसीलिए उन्होंने वैज्ञानिकों से अपील करते हुए कहा कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में धान की जो अच्छी प्रजातियां हैं उनको एकत्र कर वैज्ञानिक उनका संरक्षण करें।

कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रोफेसर डॉ. आरएस सेंगर एवं उनके शोध छात्र अभिषेक सिंह ने विलुप्त हो रही प्रजाति को बीज बैंक में संरक्षित कराया है। इस प्रजाति से भविष्य में नई प्रजातियां विकसित करने में सहायता मिलेगी। कुलपति ने इन्हें सम्मानित करते हुए कहा कि धान की देसी किस्मों पर और अधिक कार्य करने की जरूरत है। जिससे धान की खुशबू को बरकरार रखते हुए और अधिक खुशबूदार बनाया जा सके। जिससे चावल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग बढ़ेगी और उसकी कीमत भी किसानों को अच्छी मिल सकेगी।

प्रोफेसर आर एस सेंगर ने बताया की पुरानी प्रजातियों के धान अपनी तेज सुगंध व स्वाद के साथ ही भरपूर पोषण से युक्त हुआ करते थे। जिन में जिंक व आयरन भरपूर मात्रा में होता था। क्योंकि यह प्रजातियां स्वयं हजारों वर्षों में खुद ही प्रतिरोधक शक्ति विकसित करते हुए जलवायु परिवर्तन से लड़ते हुए तैयार हुई थी। इसलिए उन में बाढ़ और सूखा से लड़ने की क्षमता थी। कमी सिर्फ यही कि उनकी उपज जहां तीन चार कुंतल प्रति एकड़ थी जिससे किसानों को फायदा नहीं होता था। वहीं अब जो नई प्रजातियां बाजार में आ गई हैं, उनसे 6 से 7 कुंतल प्रति एकड़ उपज देखकर हम आसानी से बढ़ती हुई आबादी का पेट भरने में सक्षम हो सके हैं। लेकिन अधिक उत्पादकता लेने के चक्कर में धान की गुणवत्ता और खुशबू प्रभावित हुई है। जिस पर और अधिक शोध करने की आवश्यकता है। जिससे हम सभी लोग धान की खुशबू को बरकरार रखते हुए उसको और अधिक खुशबूदार और स्वादिष्ट बना सकें इसके लिए और अधिक शोध करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़कर कार्य करना होगा

पुरानी धान की प्रजाति
इनमें बस्ती का काला नमक, काला जीरा, जूही बंगाल, कनक, चीरा, धनिया और मोती बादाम, काला भात। सिद्धार्थनगर का दुबराज बादशाह पसंद, शक्कर चीनी, विष्णु पराग। बहराइच का जिनिंग सांबा, सुल्तानपुर चंदौली का लालमणि, प्रतापगढ़ का सोना चूर्ण, प्रयागराज का तुलसी, मंजरी जीरा, गोविंद भोग, विष्णु भोग, मोहनभोग, बादशाह भोग, वाराणसी गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर और मिर्जापुर क्षेत्र में उगाए जाते थे। वहीं कतरनी मिर्चा नगपुरिया, कनक जीर, सीता सुंदरी, कमल दान, जावा फूल, चिनावर बरेली के आसपास के क्षेत्र में उगाए जाने वाला हंसराज चावल अब धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *