गंगा भारतीय संस्कृति और उसकी अस्मिता की पहचान- जीबी पंत

सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय में नदियों को बचाने के लिए हुआ चिंतन
नवीन चौहान.
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत ‘गंगा स्वच्छता पखवाड़ा’ नमामि गंगे के संयुक्त तत्वावधान में नदियों एवं जल स्रोतों का पुनर्जनन विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं जागरूकता सेमिनार का उद्घाटन अल्मोड़ा परिसर के गणित सभागार में हुआ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. आर. एस. रावल ( निदेशक जी बी पंत राष्ट्रीय पर्यावरण एवं हिमालयी संस्थान, कटारमल), विशिष्ट अतिथि के रूप में GIS के विशेषज्ञ प्रोफेसर जे. एस. रावत,विशिष्ट अतिथि के रूप में जी.बी .पंत राष्ट्रीय हिमालयी एवं पर्यावरण संस्थान, कटारमल के वैज्ञानिक डॉ.जी. सी. एस. नेगी, अध्यक्ष के रूप में परिसर निदेशक प्रोफेसर नीरज तिवारी, विश्वविद्यालय की कॉर्डिनेटर डॉ ममता असवाल की उपस्थिति में हुआ। अतिथियों ने सरस्वती चित्र पर दीप प्रज्ज्वलित कर उद्घाटन किया। इसके उपरांत दृश्यकला संकाय के विद्यार्थियों ने सरस्वती गीत एवं स्वगीत गीत का गायन किया।
इस कार्यक्रम की संयोजक डॉ ममता असवाल ने कार्यक्रम के संबंध में विस्तार से रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि नमामि गंगे के तहत स्वच्छता पखवाड़ा मनाया जा रहा है। इसी के तहत आज नदियों और उनके पुनरुथान के लिए सेमिनार आयोजित की गई है। उन्होंने बताया कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में जिस तरह से प्रदूषण बढ़ रहा है वह चिंतनीय है। इसी चिंता को दूर करने और प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ये कार्यक्रम आयोजित किया गया है।
मुख्य अतिथि के रूप में जी. बी. पंत. संस्थान, कटारमल के निदेशक डॉ.आर. एस रावल ने कहा की गंगा भारतीय संस्कृति और उसकी अस्मिता की पहचान है। इसको और इसकी सहायक नदियों को बचाये जाने के लिए हमें काम करना होगा। उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर अपनी चिंता जताई और प्रेजेंटेशन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के संबंध में जानकारी दी।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में परिसर निदेशक प्रोफेसर नीरज तिवारी ने नदियों और उनके पुनरुथान को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि जागरुकता और प्रयासों से ही नदियों को प्रदूषणमुक्त किया जा सकता है। इसके लिए हमें संकल्प भी लेना होगा। और कहा कि हमें वर्षा जल का संग्रहण करना चाहिए। उन्होंने कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत भी किया।
दूसरे सत्र में विशेषज्ञ प्रोफेसर जीवन सिंह रावत ने कहा कि कोसी नदी के पुनरुथान के लिए हमने कार्य किये हैं।अब समय आ गया है कि सभी नदियों के स्रोतों को बढ़ाने के लिए हमें वन रोपण किया जाना चाहिए। हमें वर्षा जल के संग्रहण के लिए काम करना चाहिए। हमें चाल-खाल का निर्माण कर भूमिगत जल को बढ़ाने के लिए कार्य करने होंगे। उन्होंने नदियों के प्रवाह के संबंध में विस्तार से प्रेजेंटेशन देकर जानकारी दी।
तृतीय तकनीकी सत्र में विशेषज्ञ रूप में जी बी पंत संस्थान, कटारमल के वैज्ञानिक डॉ.जी. सी. एस नेगी ने कहा कि हमें जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से चिंतन करना होगा। जिस तरीके से नदियां प्रदूषित हो रही हैं। इसके लिए हमें एकजुटता के साथ इनको बचाने के प्रयास करने होंगे। अन्यथा भविष्य में इसके परिणाम बहुत भयंकर आएंगे। उन्होंने नदियों, जलवायु परिवर्तन आदि पर प्रेजेंटेशन दिया।
कार्यक्रम का संचालन और आभार डॉ ममता असवाल जताया। इस अवसर पर नूर बानो, कशिश रौतेला, सुखविंदर, हरि ओम, ऋतुराज, आँचल, गीता, मनीषा, पूजा खेतवाल, डॉ ललित जोशी सहित राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवी, छात्र छात्राएं और शोधार्थी शामिल रहे।

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