पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कुंभ को लेकर निर्णय सही, अब हो गई चूक

नवीन चौहान
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कोरोना संक्रमण को देखते हुए कुंभ महापर्व के आयोजन को लेकर जो निर्णय था वह दूरदर्शिता वाला था। व्यापारियों की नाराजगी तो थी लेकिन सभी नागरिकों के जीवन की सुरक्षा में उठाया गया एक बड़ा कदम था। फिलहाल अब हरिद्वार के जो हालात नजर आ रहे वह कोरोना विस्फोट की ओर इशारा कर रहे है। हरिद्वार में वीवीआईपी का जमावड़ा लगा है। संत लोग अपने रसूकदार भक्तों की सेवा में है। भक्त शाही स्नान की तैयारी में है। जबकि सरकार तमाशबीन बनकर संतों के आगे नतमस्तक है। हालात ऐसे है कि अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि कोरोना संक्रमित है और अस्पताल से छुटटी कर चुके है।


मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कुर्सी संभालने के बाद से सभी देशवासियों को गंगा में पुण्य की डुबकी लगाने के लिए आमंत्रित कर दिया। जिसके बाद हरिद्वार आगमन का लेकर सभी के मन में भाव जाग्रत हो गया। हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया तो सरकार को कोरोना संक्रमण को लेकर कोविड गाइड लाइन पर ध्यान गया। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने भारत सरकार की एसओपी का पालन कराने के निर्देश जारी किए। नतीजा ये रहा कि मेला प्रशासन को अपनी पूरी ताकत बार्डर पर यात्रियोें को रोकने में लगानी पड़ी। लेकिन तब तक लाखों लोग हरिद्वार में प्रवेश कर चुके है। आरटीपीसीआर की नेगेटिव रिपोर्ट को अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन कोरोना संक्रमण अपना कार्य कर चुका था। हरिद्वार में कोरोना प्रभावशाली हो गया। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि पेट दर्द, हल्के बुखार और लूज मोशन की शिकायत के चलते निजी अस्पताल में भर्ती हुए। जब कोरोना जांच कराई तो वह पॉजीटिव आई। जिसके बाद मेला प्रशासन, जिला प्रशासन और पुलिस सकते में पड़ गई। महंत नरेंद्र गिरि का हाल जानने अस्पताल में मेलाधिकारी दीपक रावत और कुंभ एसएसपी जन्मेजय खंडूरी समेत तमाम संतगण पहुंचे थे। आखिरकार हरिद्वार में हो क्या रहा है। यह किसी की समझ से परे है। कुंभ पर्व के आयोजन से हरिद्वार के व्यापारी आहत है। उनके होटल सूने पड़े है। संतों को जमीन देने की बात की जा रही है। संतों को खुश करने के सरकार के प्रयास जारी है। लेकिन जनता परेशानियों का सामना कर रही है। सरकार के निर्णय ही सवालों के घेरे में है। मेला प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिंह लगता जा रहा है। ​आखिरकार कोरोना संक्रमण काल में संतों को कुछ बातों को दरकिनार किया जा सकता था। शाही स्नान को भी सीमित तरीके से कराया जा सकता था। ताकि धर्म का संदेश पूरी दुनिया में जाए और सभी का जीवन सुरक्षित बच जाए।

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