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सिडकुल से फैक्ट्रियों का पलायन, उत्तराखंड के सैंकड़ों युवा बेरोजगार

उत्तराखंड में सिडकुल की स्थापना यहां का विकास करने तथा युवाओं को रोजगार देने के लिए की गई थी। कंपनियों को फलने—फूलने के लिए बाकायदा दस सालों तक कर में छूट का प्रावधान किया गया। लेकिन छूट खत्म होते ही सिडकुल की कई बड़ी कंपनियों ने अपना कारोबार समेट लिया और फैक्ट्री पर ताला जड़ दिया। जिसके चलते सैंकड़ों युवा एक बार फिर बेरोजगार होकर सड़क पर आ गए। अगर सितारगंज की बात करें तो यहां कई बड़ी फैक्ट्रियों के मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ है। जो यहां के युवाओं को मुंह चिढ़ा रहा है।
राज्य गठन के बाद तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने साल 2004-05 में सितारगंज में सिडकुल की स्थापना की थी। जिसके लिए संपूर्णानंद जेल की 1093 हेक्टेयर जमीन सिडकुल को दी गई। इसमें से 670 हेक्टेयर जमीन पर फैक्ट्री लगाई गई। बाकी जमीन आवासीय योजना के लिए रखी गई। उस समय उद्यमियों ने 450 हेक्टेयर जमीन खरीदी। सिडकुल में करीब 145 उद्योग लगे। लेकिन इसके बाद धीरे धीरे सिडकुल वीरान होने लगा। अब सिडकुल में करीब 82 कंपनियां काम कर रहीं हैं। पिछले चार साल के भीतर पांच बड़ी फैक्टरियों में ताला लग गया। सिडकुल से नरेन्द्रा प्लास्टिक्स, एसकेजी, महारानी पेंट्स, एएनजी और हाल ही में एमकोर फ्लेक्सिबल नामी गिरामी कंपनी बंद हो गई। जिसके चलते एक हजार से अधिक लोगों का रोजगार चला गया। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के लोगों को रोजगार देने वाली कंपनियां अगर बंद हो रही है तो सरकार और प्रशासन इन पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है। सिडकुल के फेज-2 में उद्योग नहीं आ रहे हैं। यहां पर केवल एक चाइनीज कंपनी ने अपने प्लांट लगाने का काम शुरू किया है। अभी परले एग्रो समेत किसी दूसरी कंपनी ने प्लांट लगाने का काम शुरू नहीं कराया है। एल्डिको के डीजीएम संदीप चावला ने बताया कि कुछ फैक्टरी चली गयी है तो कुछ नई भी आ रही है। ऐसे में राज्य सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा और एक दूरगामी रणनीति के तहत उद्योगों की स्थापना करनी होगी। ताकि उत्तराखंड में युवाओं को पलायन के लिए विवश ना होना पड़े। राज्य में ही रोजगार मिले और यहां की अर्थव्यवस्था बेहतर हो।

सितारगंज से नारायण सिंह रावत की रिपोर्ट

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