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विश्व रेबीज दिवस पर लगाया कुत्तों को रेबीज का निशुल्क टीका

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मेरठ। सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ द्वारा विश्व रेबीज दिवस के अवसर पर श्वानों में निशुल्क रेबीज का टीका लगाया गया। 28 सितंबर, 2020 को पूरे विश्व में विश्व रेबीज दिवस (World Rabies Day) मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य जानवरों और इंसानों पर रेबीज के प्रभाव तथा इसे रोकने के उपायों के विषय में जागरूकता का प्रसार करना है।
लुई पाश्चर के जन्मदिवस पर मनाते हैं विश्व रेबीज दिवस
यह दिवस फ्रांस के प्रसिद्ध रसायन और सूक्ष्म जीव विज्ञानी लुई पाश्चर के जन्म दिवस के अवसर पर 28 सितंबर को मनाया जाता है। लुई पाश्चर ने ही पहली रेबीज वैक्सीन विकसित की थी। विश्व रेबीज दिवस ग्लोबल एलायंस फॉर रेबीज कंट्रोल द्वारा शुरू की गई पहल है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2007 में की गई थी।
रेबीज एक विषाणु जनित रोग— कुलपति
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. आरके मित्तल ने बताया कि रेबीज एक विषाणु जनित रोग है, इसके कारण गर्म रक्त वाले जीवों के मस्तिष्क के सूजन (एक्यूट इन्सेफेलाइटिस) होती है। यह एक जूनोटिक बीमारी है अर्थात यह एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में फैलती है, यह आमतौर पर कुत्तों के काटने अथवा संक्रमित जानवरों से खरोंच लगने के कारण होता है। रेबीज वायरस केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, जिससे मस्तिष्क में रोग उत्पन्न होता है और अंत में रोगी की मृत्यु होती है।
घरेलू कुत्ता रेबीज का प्रमुख स्त्रोत
घरेलु कुत्ता रेबीज वायरस का प्रमुख स्त्रोत होता है। रेबीज के कारण होने वाली 95% मौतें कुत्तों के कारण होती हैं। रेबीज के प्रमुख लक्षण रोशनी व पानी से डर है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, अफ्रीका और एशिया में होने वाले 95% मामलों में रेबीज के कारण सालाना 150 से अधिक देशों में 59000 मानव मौतें होती हैं. रेबीज एक घातक वायरस है जो संक्रमित जानवरों की लार से फैलता है।
दो प्रकार के वायरस
रेबीज के लक्षणों को दो प्रकार के वायरस के अनुसार विभाजित किया जा सकता है-
उग्र रेबीज- इस प्रकार से अति सक्रियता होती है और संक्रमित व्यक्ति अनियमित व्यवहार दिखा सकता है। इस भ्रम के साथ, चिंता, अनिद्रा, आंदोलन, निगलने में कठिनाई और मतिभ्रम और पानी का डर भी विकसित हो सकता है। इस प्रकार में, कार्डियो-श्वसन में गड़बड़ी होने पर मृत्यु होती है।
पैरालिटिक रेबीज– यह रूप आमतौर पर लक्षणों को दिखाने में अधिक समय लेता है लेकिन ये काफी गंभीर होते हैं। संक्रमित व्यक्ति धीरे-धीरे पंगु हो जाता है और कोमा में चला जाता है। प्रभावित क्षेत्र से मांसपेशियां लकवाग्रस्त होने लगती हैं और बाद में विभिन्न भागों में फैल जाती हैं। कोमा के बाद अंतिम अवस्था मृत्यु है।
टीेके लगाने से किया जा सकता है नियंत्रित
पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. राजबीर सिंह ने बताया कि भारत में प्रतिवर्ष रेबीज से इंसानों की मृत्यु होती है, जिसकों हम पालतू जानवरों को टीके लगाने से नियंत्रित कर सकते हैं। इस अवसर पर पशुपालन विभाग के डा. प्रीतपाल सिंह, डा. नागेन्द्र सिधु एवं पशुचिकित्सा महाविद्यालय के डा. तरुण सरकार, डा. अमित वर्मा, डा. अरबिंद सिंह, डा. अजीत कुमार सिंह, डा. जितिन एवं डा. विनोद वरुण मौजूद रहे।

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